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भूख पर हावी अपच

— अनिल चतुर्वेदी —
जिस तडक़े से दाल का स्वाद दुगुना हो जाता है, हम इस अंक में उसी तडक़े के बे-स्वाद होने की चर्चा कर रहे हैं। इस मसले को खास तवज्जो देने की वजह है युवा आबादी की बेरोजगारी, जो लोकसेवकों की स्वार्थी सोच के तडक़े से गंभीर होती जा रही है। जरा सोचिये, एक तरफ देश की बड़ी आबादी पैसे-पैसे को मोहताज हो रही है। हाड-़तोड़ मेहनत के बाद भी इतनी कमाई नहीं कर पा रही है, जिससे वो सुख-चैन की जिंदगी जी सके। वहीं, दूसरी तरफ मठ्ठीभर राज्यकर्मी ताजिंदगी मान-सम्मान और सम्पन्नता की गारंटी लेकर मौज कर रहे हैं। इनके अनंत लालच में कुर्सी का मोह भी शामिल है। नौकरी के लंबे दौर में इधर से उधर डेपुटेशन की मलाई खाने के बाद रिटायरमेंट के आगे-पीछे सेवा विस्तार का अमृत चखना ही इनकी दाल का वो तडक़ा है, जो वंचितों के निवाले को बे-स्वाद बना रहा है।
पर अफसोस कि जिम्मेवार राजपुरुषों का तबका इस समस्या को जानबूझ कर नजरंदाज कर रहा है। देशप्रेम का देसराग तो सभी देशभक्त (राजपुरुष) छेड़ते फिर रहे हैं, लेकिन असलियत में वे समस्या के विकराल हवन में आहुति दे रहे हैं।
बेरोजगारी की आज जो समस्या है, उसे काफी हद तक कम करने का रामबाण सरकार के ही पास है। क्योंकि वही देश की सबसे बड़ी नियोक्ता है। किंतु सरकारी आका पता नहीं कहां से, कौन सा ज्ञान प्राप्त करके आए हैं, जो सरकारी भर्तियों को सीमित करने के साथ-साथ मौजूदा पदों को समाप्त करते जा रहे हैं। जहां कहीं बहुत जरूरी हुआ तो डेपुटेशन या सेवा-विस्तार की बैसाखी का सहारा लेकर कामचलाऊ व्यवस्था तैयार कर रहे हैं। जिस तेजी से देश की आबादी बढ़ रही है, उतनी ही रफ्तार से सरकार खुद को समेटती जा रही है। ये आलम तो तब है, जब हर क्षेत्र में इंस्पैक्टर राज पैर पसारे हुए है। सभी जगह सरकारी दखलंदाजी की चुभन महसूस होती है। मगर सीमित श्रमशक्ति की वजह से जनता के काम अटक रहे हैं। चुभन को सुख की अनुभूति में बदलने की पहल कर सकने वाले राजपुरुष केवल ‘सबका साथ-सबका विकास’ की जुमलेबाजी में मशगूल हैं।
तभी तो सरकारी कामकाज में आउटसोर्स के जरिए निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाई जा रही है। सार्वजनिक उपक्रमों को विनिवेश के नाम पर निजी कंपनियों को सौंपा जा रहा है। जो काम नहीं सौंपे जा सकते, उनके लिए डेपुटेशन का फंडा चल रहा है। नहीं तो रिटायर कर्मियों से काम लिया जा रहा है। युवा शक्ति से सरकारी तंत्र में नई जान फूंकने की कवायद बहुत सीमित मात्रा में की जा रही है।
इसे संवेदनहीनता की पराकाष्ठा ही कहा जाएगा कि नौकरी के लिए भटक रहे युवाओं के प्रति शासन-प्रशासन को जरा भी हमदर्दी नहीं है। राजपुरुष हों, अधिकारी हों या बाबू, सभी पैसों की चिंता से मुक्त होकर इसी जुगाड़ में लगे रहते हैं कि कैसे उनके साथ राज का रुतबा ताजिंदगी जुड़ा रहे। उनका बस चले तो मरते दम तक पेंशन के साथ-साथ बाकी सारी सरकारी सुविधाओं का लाभ लेते रहें। इनका मन युवा पीढी के लिए भी सुखी जीवन के अवसर बनाने को खुद की कुर्सी खाली करने का होता ही नहीं है।
तभी तो सरकारी अमले में गैर-सरकारी जमात को भी अपनी तरह सुविधा-सम्पन्न बनाने के प्रयास करने की सोच विकसित ही नहीं हुई है। वे खुद की जरा-जरा सी मांगों के लिए तो आंदोलन की राह पकडऩे में देर नहीं करते, लेकिन वंचित जमात के हक की लड़ाई के लिए कभी खड़े नहीं होते। जिस दिन सरकारी अमला अपने समान दूसरे का भी पेट भरने की दरियादिली दिखाने लग जाएगा, तभी से देश खुशहाली की दिशा में बढऩे लगेगा।

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