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मुद्रा तांडव ; नौकरी-कंगाली

— अनिल चतुर्वेदी —
इस लोकसभा चुनाव में पैसे की महिमा खूब नजर आई। इसे देख कर ही करीब छह माह पहले बोले गए एक बड़े व्यवसायी के बड़बोल याद आ गए। राजस्थान चैंबर ऑफ कॉमर्स के इस पदाधिकारी ने उसी समय बोल दिया था कि आने वाले चुनावों में धनवर्षा का नजारा कुछ औऱ ही होगा। पैसा पानी की तरह बहाकर चुनाव जीता जाएगा। वो सज्जन रौ में यह भी बोल गए कि इन चार सालों में खूब पैसा बांटा गया है। घर-घर जाकर दिया गया है। इस शर्त पर कि, चुनाव के समय उनकी ओर से मुद्रा प्रवाह रुकना नहीं चाहिए। धन की कमी से पार्टी खर्च में अटकाव न आने पाए।
उन व्यवसायी का इतना बड़ा खुलासा गहन जांच का विषय हो सकता है। इस पर फिर कभी चर्चा की जाएगी। अभी तो यही कह सकते हैं कि व्यवसायी महोदय के बोलों और बेहिसाब चुनावी खर्च में कोई अंतर शायद ही किसी को दिखा होगा। इसका प्रमाण मीडिया रिपोर्ट्स भी हैं, जो इस आम चुनाव को 2014 के चुनाव से करीब 40 फीसदी मंहगा बता रहीं हैं। पैसे की इस फूहड़ नुमाइश को देखकर सवाल यही उठता है कि क्या सत्ताधीशों का राजधर्म तड़क-भड़क, दिखावे पर टिक गया है? क्या पैसों की मायानगरी ही उनका रामराज्य है? जिसमें जनता के अमन-चैन औऱ सौहार्द के लिए कोई स्थान नहीं रहा। प्रश्न गंभीर हैं, जिनके जवाबों को पैसों के ढेर के नीचे दबाया नहीं जा सकता।
इस अंक का मुख्य मुद्दा युवाओं की एक अलग ही पीड़ा से जुड़ा है। बेरोजगारी से जूझ रही युवा पीढी नौकरी पाने के चक्कर में कंगाल होती जा रही है। नौकरी प्रदाता का खजाना भर रहा है औऱ आकांक्षियों की जेब खाली हो रही हैं। ये हालात साल दर साल बदतर हो रहे हैं, क्योंकि बेरोजगारों की कतार बढ रही है। स्कूल-कॉलेज की परीक्षाओं में सफलता का ग्राफ तो रॉकेट की रफ्तार पकड़े हुए है, लेकिन भर्ती परीक्षाओं की चाल सुस्त है। थोड़ी सी संख्या में भर्तियां हो रही हैं। और जो हो रही हैं, उनमें भी नौकरी हाथ लगने तक का रास्ता लंबा हो चला है। अभ्यार्थी पहले तैयारी में सिर खपाएं। फिर लिखित परीक्षा दें। पास हो जाएं तो साक्षात्कार में शामिल हों। इसमें भी सफल होने के बावजूद तत्काल नौकरी लगने की गारंटी नहीं है। कोई न कोई विफल अभ्यर्थी कोर्ट पहुंच कर भर्ती अटकवा दे रहा है।
नौकरी पाने की तैयारी से लेकर इसके हाथ लगने का तक का सफर जितना लंबा होता जा रहा है, अभ्यर्थियों पर आर्थिक बोझ उतना ही बढता जा रहा है। तैयारी के लिए कोचिंग की भारी-भरकम फीस, फिर भर्ती परीक्षा का शुल्क, परीक्षा देने के लिए यहां-वहां की यात्रा का खर्च। ये सारे खर्चे एक बारीय नहीं हैं, बल्कि नौकरी मिलने तक बार-बार भर्ती परीक्षाएं देने में इनका दोहराव हो रहा है। ये दोहन युवाओं के प्रति ज्यादती नहीं तो क्या है। सरकार अथवा निजी नियोक्ता भर्ती प्रक्रिया को आसान औऱ सस्ता तो नहीं बना बना ही सकते हैं। वे भर्ती निकालने से लेकर नौकरी देने तक निश्चित समय सीमा वाली सुचारु व्यवस्था भी विकसित कर सकते हैं।
नियोक्ता नौकरी भले ही कम दें, लेकिन उक्त उपाय करके वे रोजगार चाहने वालों को अनावश्यक आर्थिक बोझ से तो राहत दिलवा ही सकते हैं। ऐसा करने से कम से कम उनके जनहितैषी नजरिये पर सवाल खड़े नहीं होंगे।

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