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सत्तर सालों पर ही इतरा रहा..आज

प्रधानसेवक और उनके दलीय साथियों ने एक वाक्य पेटेंट करा लिया, लगता है।...सत्तर साल में कुछ नहीं हुआ, जो इन कुछ सालों में हुआ है...। ये वाक्य सुनते-सुनते कान पक गए तो सोचा, क्यों न इसपर गौर ही कर लिया जाए।
सत्तर साल में कुछ नहीं हुआ...ये कैसे मान लिया जाए? अगर कुछ नहीं हुआ तो 1971 में पाकिस्तान का पूर्वी हिस्सा कैसे गायब हो गया? उसकी जगह बांग्लादेश कैसे बन गया? यह भी देखें कि सत्तर सालों में ही भारत में आर्थिक सुधार की शुरूआत हुई। बाजार खुले और कम्प्यूटर देश में आया। याद कीजिए 70 तक के दशक को, जब किसी घर में टेलीफोन कनेक्शन लेना आसान नहीं था। आमजन दूसरे शहर में रहने वाले परिचितों का हालचाल चिठ्ठी—पत्री लिखकर पूछा करते थे। उनसे बात करने को ट्रंककॉल करने टेलीफोन एक्सचेंज जाया करते थे। वहां कभी तुरंत तो कभी घंटों लग जाया करते थे, कॉल लगने में।
सरकारी तंत्र का कम्प्यूटरीकरण होने से आज घर-घर में टेलीफोन ही नहीं, करोंड़ों हाथों में मोबाइल भी दिख रहा है। जिनसे पूरे देश में ही नहीं, दुनिया के किसी भी कोने में जब मन चाहे बात की जा सकती है। बैकिंग सेक्टर में लिखाई बंद होती चली है। परिवहन सेवाओं में ऑनलाइन बुकिंग सुविधा घर बैठे प्राप्त हो रही है। और न जाने कौन-कौन से कामों का सरलीकरण हो गया है।
और तो और डिजिटल क्रांति के सहारे ही प्रधानसेवक अपनी ‘शो-मैनशिप’ चमका रहे हैं। सोशल मीडिया उनकी सियासी मार्केटिंग का प्रमुख आधार बना हुआ है। इन सुविधाओं का बीजारोपण सत्तर सालों में ही हुआ है।
ऑटोमोबाइल सेक्टर देख लीजिए। एम्बेसडर, फिएट कारें और बजाज, लेम्ब्रेटा, राजदूत, जावा, बुलेट आदि दुपहिया वाहन छोड़ आज हम एक से एक लग्जरी कारों और स्कूटर-मोटरसाइकिलों पर घूम रहे हैं। ये सब सत्तर सालों में दुनिया के लिए भारतीय बाजार खोलने तथा तकनीकी आदान-प्रदान से ही संभव हो पाया।
फिर भी प्रधानसेवक, उनका दल और अनुयायी ये न माने तो यही कहा जाएगा कि समृद्ध अतीत को भुला देने वाला राजा सिर्फ वर्तमान के सहारे अपने राज का ढोल पीट सकता है, पुख्ता रूप से कुछ कर नहीं सकता।

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