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उपद्रवियों से निबटने का नया अंदाज

— रतन मणि लाल —
बीता साल 2019 जाते जाते देश में अशांति व तनाव का एक और मुद्दा देता गया। दिसम्बर में संसद के दोनों सदनों में नागरिकता (संशोधन) अधिनियम के बहुमत से पारित होने के दो दिन बाद से ही देशभर में इसके विरोध में प्रदर्शन शुरू हो गए। इस संशोधन की चर्चा राजनीतिक बहस में लगातार छाई हुई है। वहीं इसके पारित होते ही विपक्षी दलों और कुछ सामाजिक व मुस्लिम समुदाय से सम्बद्ध दलों व संगठनों द्वारा इसका मुखर विरोध शुरू हो गया। कुछ दिनों तक शांतिपूर्वक रहने के बाद ये प्रदर्शन उग्र होने लगे और 15 दिसम्बर के बाद प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा ने पूरे देश को हिला कर रख दिया।
टीवी न्यूज व क्लोज्ड सर्किट टीवी की फुटेज से साफ-साफ देखा गया कि प्रदर्शनकारियों के नाम पर उपद्रवी तत्व सरकारी व निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने में तनिक भी नहीं हिचक रहे थे। शुरू में ये प्रदर्शन केवल दिल्ली और कुछ राज्यों तक सीमित रहे - ये विशेषकर वे राज्य थे जहाँ भारतीय जनता पार्टी की सरकार है - लेकिन जल्द ही इन प्रदर्शनों में एक सोचा समझा पैटर्न दिखने लगा। एक जगह पर एक दिन हिंसक प्रदर्शन हुए और दूसरे दिन दूसरी जगह। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ अल्पसंख्यक-बहुल जिलों में प्रदर्शन लगातार होते रहे। दिसम्बर 19 को स्थिति इतनी गंभीर हुई कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने शांति की अपील करते हुए उपद्रवियों को चेतावनी दी कि उन्हें चिन्हित कर उनके खिलाफ कड़ी कार्यवाई की जाएगी।

योगी की प्रतिक्रिया
मुख्यमंत्री ने सीएए और एनआरसी को लेकर हुए प्रदर्शन और हिंसा पर गहरी नाराजगी जताते हुए कहा कि उपद्रवियों की संपत्ति जब्त कर सार्वजनिक संपत्ति को हुए नुकसान की भरपाई की जाएगी। इस संबंध में उन्होंने अपर मुख्य सचिव (गृह) और डीजीपी को आदेश दिया कि उपद्रवियों से सख्ती से निपटा जाए और एक-एक उपद्रवी की पहचान कर उनकी संपत्ति जब्त कर नुकसान की भरपाई करने की कार्रवाई की जाए। राजधानी लखनऊ, संभल, मेरठ में नागरिकता कानून के विरोध में हिंसा बड़े पैमाने पर हुई थी। संभल और लखनऊ में हिंसा के दौरान लगभग एक दर्जन वाहनों में आग लगा दी गयी थी।
टीवी पर दिए गए अपने बयान में मुख्यमंत्री ने कहा कि जो भी जिम्मेदार होगा, उसकी जवाबदेही भी तय करेंगे। हिंसा में लिप्त प्रत्येक व्यक्ति की संपत्ति को जब्त करेंगे और उस जब्त संपत्ति से सार्वजनिक संपत्तियों को पहुंचाए गए नुकसान की भरपाई भी हम उपद्रवियों से करेंगे। सब चिह्नित चेहरे हैं। सब वीडियोग्राफी में आ चुके हैं। सीसीटीवी की फुटेज में आ चुके हैं। सबकी संपत्ति को जब्त कर इनसे हम इसका ‘बदला’ लेंगे और सख्ती से निपटने के लिए मैंने इस बारे में कहा है। प्रदर्शन के नाम पर हिंसा स्वीकार्य नहीं है। असामाजिक और अराजक गतिविधियों को कतई किसी भी स्थिति में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
उनके बयान में ‘बदला’ शब्द के प्रयोग पर विपक्ष के नेताओं ने आपत्ति भी जताई और सोशल मीडिया पर इसके विरुद्ध काफी शोर-शराबा मचा, लेकिन पहचाने गए लोगों के खिलाफ हुई कार्यवाई की खबरों के आगे यह मुद्दा आगे बढ़ नहीं पाया। शुरू में ऐसा लगा कि यह ‘कड़ी कार्यवाई’ की चेतावनी सरकारों और नेताओं द्वारा दिए गए बयानों से कुछ खास अलग नहीं होगी, लेकिन उसके कुछ दिनों बाद ही ऐसी खबरें आने लगीं कि पुलिस ने टीवी और क्लोज्ड सर्किट फुटेज के आधार पर हिंसा फैलाने वाले तत्वों की पहचान कर ली है और उनके मोबाइल द्वारा उनके लोकेशन का पता लगाकर, उनके खिलाफ उनकी संपत्ति जब्त कर हिंसा में हुए नुकसान की भरपाई किए जाने के नोटिस भेजे जा रहे हैं।
उसके बाद उत्तर प्रदेश पुलिस के मुखिया ओ पी सिंह और अन्य मंत्रियों व अधिकारियों ने भी इस बात की पुष्टि की, कि इस प्रकार की कार्यवाई की जा रही है।

बड़े पैमाने पर हिंसा
उत्तर प्रदेश में शुक्रवार 20 दिसम्बर के हंगामे के बाद अगले दिन लखनऊ, बिजनौर, मेरठ, फिरोजाबाद, कानपुर, संभल, मुरादाबाद, मुजफ्फरनगर, हाथरस, बहराइच और बुलंदशहर में इंटरनेट बंद किया गया। लखनऊ हंगामे के बाद 218 लोग जेल गिरफ्तार कर जेल भेजे गए। इन सबकी पहचान प्रदर्शनकारी और भीड़ को उकसाने वालों के तौर पर की गई थी। प्रयागराज में 150 से ज्यादा प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार किया गया। प्रदेश के विभिन्न जिलों में कथित तौर पर हिंसा में शामिल 450 से अधिक लोगों को भेजे गए इन नोटिसों में उनकी निजी संपत्ति को जब्त करने की बात कही गई। सार्वजनिक संपत्ति के नुकसान की भरपाई के लिए भेजे गए रिकवरी नोटिस का जवाब देने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने सात दिनों का वक्त दिया। सरकार ने कहा कि अगर आरोपी तय समय सीमा के अंदर नोटिस का जवाब नहीं देता है, या उनका जवाब संतोषजनक नहीं पाया जाता है, तो सरकार आगे की कार्यवाही शुरू करेगी।
विभिन्न जिलों में भेजे गए नोटिसों में लखनऊ जिले में सर्वाधिक 152 लोगों को नोटिस भेजे गए हैं। लखनऊ में सार्वजनिक संपत्ति के नुकसान की कीमत करीब 2.5 करोड़ रुपये आंकी गई है। इसके अलावा मेरठ में 148, बिजनौर में 43 और मुजफ्फरनगर में 40 लोगों को नोटिस भेजे गए हैं।
यूपी सरकार ने 2010 के इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश के आधार पर ये नोटिस भेजे हैं, जिसके मुताबिक विरोध प्रदर्शनों या दंगों के दौरान नष्ट की गई सार्वजनिक संपत्ति के नुकसान की भरपाई के लिए राज्य सरकार को वह दोषियों से वसूली की अनुमति देता है। हाईकोर्ट के आदेश में कहा गया था, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान का आकलन किया जाएगा और संबंधित विभाग, स्थानीय निकाय, सार्वजनिक निगम और संपत्ति के मालिक राजनीतिक दलों/व्यक्तियों (जो हिंसा में तब्दील हुए प्रदर्शनों के लिए जिम्मेदार हैं) से नुकसान के भरपाई की वसूली का दावा करेंगे।

क्या है कानून
कानून के जानकार बताते हैं कि इस बारे में सार्वजनिक संपत्ति नुकसान रोकथाम अधिनियम 1984 है, जिसके प्रावधानों के मुताबिक अगर कोई व्यक्ति सरकारी या सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने का दोषी साबित होता है तो उसे 5 साल की सजा हो सकती है। इसमें जुर्माने का भी प्रावधान है। ऐसे मामलों में दोषी पाए जाने पर सजा और जुर्माना दोनों हो सकता है।
कानून के मुताबिक सार्वजनिक और सरकारी संपत्ति का नुकसान पहुंचाने के दोषी को तब तक जमानत नहीं मिल सकती, जब तक कि वो नुकसान की 100 फीसदी भरपाई नहीं कर देता है। सार्वजनिक संपत्ति नुकसान रोकथाम अधिनियम 1984 केंद्रीय कानून है। इसके अलावा अलग-अलग राज्यों ने इस बारे में अपने-अपने कानून बना रखे हैं। केंद्रीय कानून के अलावा राज्यों के कानून के मुताबिक ऐसे मामलों में दोषियों को सजा सुनाई जाती है।
उत्तर प्रदेश में ऐसे नोटिस जारी होने के बाद से ही तमाम खबरें आने लगीं कि जिन लोगों के खिलाफ नोटिस भेजे गए वे या तो जीवित ही नहीं हैं या वृद्ध और घरों में थे, या किसी और स्थान पर थे, या किसी जरूरी काम से सामान या दवा लेने बाहर निकले थे और उनकी पहचान उपद्रवियों के तौर पर की गई।

प्रक्रिया का समर्थन
खबरों के अनुसार कर्नाटक सरकार द्वारा भी ऐसी ही प्रक्रिया अपनाये जाने पर विचार किया जा रहा है और बेंगलुरू व अन्य शहरों में नागरिकता कानून के विरोध में हुई हिंसा में शामिल उपद्रवियों की पहचान करने का काम शुरू हुआ है। भारतीय रेलवे में भी इस मुद्दे पर हुई हिंसा की भरपाई करने पर ऐसी ही प्रक्रिया अपनाये जाने पर विचार किया जा रहा है।
रेलवे बोर्ड चेयरमैन विनोद कुमार यादव ने बताया कि तोडफ़ोड़ और हिंसा से देशभर में रेलवे की संपत्ति को 80 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है और नुकसान की भरपाई उन लोगों से की जाएगी, जिन्होंने तोडफ़ोड़ और हिंसा की है। इसमें पूर्व रेलवे को 70 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ और उत्तर-पूर्व सीमांत रेलवे को 10 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। विरोध प्रदर्शन के दौरान रेलवे को सबसे ज्यादा नुकसान बंगाल में हुआ है जो कुल नुकसान का करीब 80 फीसदी है। पूर्वी रेलवे का बड़ा हिस्सा पश्चिम बंगाल में पड़ता है और सबसे ज्यादा नुकसान इसी जोन को हुआ है।
प्रदर्शनों के दौरान पश्चिम बंगाल में प्रदर्शनकारियों ने संकरेल रेलवे स्टेशन के टिकट काउंटर के एक हिस्से को जला दिया, सुजनीपारा रेलवे स्टेशन पर तोडफ़ोड़ की गई, कृष्णापुर रेलवे स्टेशन पर खड़ी कई ट्रेनें को आग के हवाले कर दिया गया और पड़ोसी मालदा जिले के हरिश्चंद्रपुर स्टेशन पर तोडफ़ोड़ की गई। असम में भी रेलवे की संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया, जहां उत्तर पूर्व सीमांत रेलवे को ट्रेनों को रद्द किए जाने से नुकसान का सामना करना पड़ा। सूत्रों ने संकेत दिया है कि रेलवे की संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के दोषी पाए गए लोगों पर भारतीय रेल अधिनियम की धारा 151 लगाई जाएगी, जिसके तहत अधिकतम सात साल की कैद की सजा है। रेलवे नुकसान की भरपाई के लिए अदालत का भी रुख कर सकता है।
कर्नाटक में भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने भी यूपी की योगी सरकार की तर्ज पर कदम बढ़ा दिए हैं। कर्नाटक के मुख्य मंत्री बीएस येदियुरप्पा ने हिंसा की घटनाओं में सार्वजनिक संपत्ति को हुए नुकसान की भरपाई उपद्रवियों से ही करने का ऐलान कर दिया है। कर्नाटक भाजपा ने भी एक बयान में कहा है कि उपद्रवियों के लिए कोई दया नहीं है और उपद्रवी अपनी हिंसा के लिए भुगतान करेंगे।
देश के कई शहरों में आम लोगों में इस प्रक्रिया का समर्थन देखने को मिल रहा है। सोशल मीडिया पर आ रही प्रतिक्रियाओं से ऐसा लगता है कि उपद्रव के मुद्दे के विरोध या समर्थन के बावजूद, उपद्रवियों पर सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने के एवज में उन्ही से नुकसान की भरपाई करने की कार्यवाई से लोग सहमत हैं।
विपक्ष का दावा
विपक्षी दलों कांग्रेस व समाजवादी पार्टी ने पुलिस की कार्यवाई पर सवाल उठाते हुए कहा है कि पुलिस निर्दोष लोगों पर अत्याचार कर रही है। इन दिनों राजनीतिक सक्रियता दिखा रहीं कांग्रेस की महासचिव और उत्तर प्रदेश की प्रभारी प्रियंका गांधी वाड्रा ने लखनऊ स्थित पूर्व आईपीएस अधिकारी एस आर दारापुरी और सदफ जफर के घर जाकर उनके परिजनों से मुलाकात की। कुछ दिन बाद वे मेरठ गईं और वहां भी ऐसे तथाकथित पीडि़तों के परिजनों से मिलीं और पुलिस की कार्यवाई के खिलाफ रोष जताया।
कांग्रेस पार्टी व समाजवादी पार्टी ने इस प्रकार के लोगों की आर्थिक सहायता करने की भी घोषणा की है और कई लोगों को आर्थिक सहायता दी भी है। सपा के नेता अखिलेश यादव भी कई ऐसे लोगों के परिवार जनों से मिल कर उन्हें समर्थन व मदद देने का वादा कर चुके हैं।

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