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विज्ञान जगत में हलचल

— विनोद वाष्र्णेय —
इस साल फरवरी में विश्व में पहली बार दो डिजाइनर बेबीज के जन्म की खबर सार्वजनिक हुई। ये जुड़वां बच्चियां अभी सात महीने की भी नहीं हुईं, पर दुनिया भर के तमाम जेनेटिक वैज्ञानिकों को चिंता है कि इन बेबीज का हश्र क्या होगा। अधिकतर आनुवांशिक वैज्ञानिकों का मानना है कि जीन-एडिटिंग के फलस्वरूप पैदा हुए इंसान को अवांछित साइड-इफेक्ट्स का दुष्परिणाम भुगतना पड़ सकता है। चीन में परखनली गर्भाधान (आईवीएफ) के जरिये पैदा हुई इन बच्चियों के नाम हैं लूलू और नाना। वे विश्व की पहली मानव संतान हैं जिनके जीन भ्रूण स्तर पर ही सम्पादित कर ठीक कर दिए गए। अमेरिका की राइस यूनिवर्सिटी और स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी से शिक्षित और चीन की सदर्न यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एन्ड टेक्नोलॉजी के बायोलॉजी विभाग में असोसिएट प्रोफेसर रहे जियानकुई के इस प्रयोग ने विश्व के वैज्ञानिक जगत में भूकम्पीय तहलका मचा दिया। हालांकि एक नजरिया यह भी था कि यदि इंसान पर किया गया यह पहला प्रयोग सफल होता है तो इससे भविष्य में अधिक क्षमता सम्पन्न, बुद्धिमान और रोगों से मुक्त ‘सुपरमैन’ पैदा किये जा सकेंगे।
उन्होंने इसे इस बात की उद्घोषणा माना कि अब जीन संशोधन के जरिये सचमुच में नस्ल-सुधार का युग आ चुका है। इतिहास में नस्ल-सुधार के समर्थक अनेक विचारक रहे हैं, लेकिन अधिसंख्य समाज विज्ञानी और विचारक इसे समाज के लिए खतरनाक जोखिम मानते हैं। इसलिए आश्चर्य नहीं कि जैसे ही एडिटेड जीन वाली उक्त दो बच्चियों के जन्म की खबर उजागर हुई, अगले ही दिन से विश्व भर में जेनेटिक वैज्ञानिकों की ओर से उक्त प्रयोग की भत्र्सना शुरू हो गई। इन सबसे इतर वैज्ञानिक ने ‘क्रिस्पर’ नाम की जीन-एडिटिंग टेक्नोलॉजी के प्रयोग से मिली सफलता का उल्लेख गर्व से किया। ध्यान देने योग्य बात है कि जेनेटिक चिकित्सा का प्रयोग बढ़ता जा रहा है। इसे आधुनिक विज्ञान का अनूठा वरदान माना जाता है। जेनेटिक चिकित्सा से कई असाध्य बीमारियों के ठीक होने के दावे अक्सर अनुसन्धान पत्रिकाओं में आते रहते हैं। लेकिन ये सब प्रयोग व्यक्ति में जन्म के बाद हुए हैं और अगर जेनेटिक चिकित्सा का कोई साइड-इफेक्ट होता भी है तो उसे केवल वह व्यक्ति ही भोगेगा। लेकिन भ्रूण स्तर पर यदि कोई जेनेटिक हेर-फेर की जाती है तो उसका लाभ हो या नुकसान, वह पीढ़ी दर पीढ़ी चलता है। इसीलिए जेनेटिक वैज्ञानिकों में यह सर्वसम्मति है कि जब तक किसी जीन के हेर फेर से नफा-नुकसान संबंधी सभी आयामों को जान-समझ न लिया जाए तब तक भ्रूण स्तर पर इसका इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। परन्तु उक्त चीनी वैज्ञानिक ने संभवत: वैज्ञानिक इतिहास में नाम कमाने की गरज से उक्त अनैतिक काम कर डाला।
जियानकुन ने दावा किया है कि उन्होंने यह काम मानव हित में किया क्योंकि उन्होंने उन माँ बाप को संतति सुख दिया है जो दोनों ही एचआईवी/एड्स संक्रमण से ग्रस्त थे। अगर वे सामान्य ढंग से बच्चे पैदा करते तो उनमें एचआईवी नामक वायरस अंतरित हो जाता जबकि जीन एडिटिंग करके उन्होंने उस जीन को ही हटा दिया, जो एचआईवी संक्रमण को संभव बनाता है। अब ये लड़कियां कभी इस वायरस की शिकार नहीं होंगी।
इस टेक्नोलॉजी के प्रयोग से एचआईवी ग्रस्त लोग स्वस्थ बच्चे पैदा कर सकेंगे। चूंकि चीन में इस संक्रमण का काफी प्रकोप है, यह टेक्नोलॉजी एचआईवी /एड्स से निपटने में बेहद मददगार हो सकती है। ज्यादातर वैज्ञानिकों ने जियानकुन के उक्त तर्क को लचर बताया और कहा कि जब एचआईवी/एड्स से निपटने के वैकल्पिक तरीके मौजूद हैं तो यह जोखिम भरा प्रयोग करने की क्या जरूरत थी। ‘अगर उक्त जीन को हटा देने से बच्चों को किसी नई और अज्ञात बीमारी का जोखिम आ गया हो,तो उसका कौन जिम्मेवार होगा?’ इस तरह के कई वैज्ञानिक लेख छप चुके हैं,जिनमें आशंका जताई गई है कि इस जीन को हटा देने से व्यक्ति में अन्य वायरसों के संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है। इस बात पर बल देते हुए कुछ ही दिन पहले ‘एमआईटी टेक्नोलॉजी रिव्यू’ में रिपोर्ट प्रकाशित हुई है कि जीन-संशोधित बच्चियां पूरा जीवन नहीं जी पाएंगी।
यह निष्कर्ष इंग्लैंड में 4 लाख वॉलयिंटरों के डीएनए संकलित कर बनाए गए जीन बैंक के विश्लेषण के आधार पर निकाला गया है। इसके विपरीत एक प्रयोग में पाया गया कि चूहों में से उक्त जीन निकाल देने से उनकी याददाश्त बढ़ जाती है। इस आधार पर यह कयास लगाए जा रहे हैं कि ये जीन-एडिटेड बच्चियां अधिक बुद्धि सम्पन्न हो सकती हैं। इसी साल फरवरी में इस जीन की एडिटिंग से मस्तिष्काघात (स्ट्रोक) की वजह से लुप्त हो चुकी याददाश्त बहाल होने संबंधी रिपोर्ट प्रकाशित हुई है। यह इस बात का सबूत भी है कि किसी एक विशेषता के लिए चिह्नित जीन अन्य अनेक कामों या विशेषताओं के लिए भी जिम्मेदार होता है।
पश्चिम के कई वैज्ञानिकों ने संदेह व्यक्त किया है कि उक्त चीनी वैज्ञानिक की मंशा संभवत: एचआईवी से निजात दिलाने की जगह अधिक बुद्धिमान बच्चे पैदा करने की रही होगी।
यह भी आशंका व्यक्त की जा रही है कि अगर अधिक बुद्धिमान बच्चे पैदा करने के इस तरीके पर लोगों का विश्वास होने लगा तो जीन-एडिटिंग-आधारित परखनली शिशु पैदा करने का कारोबार जोर-शोर से चल पड़ेगा। बहरहाल, विश्व भर में जिस तरह से उक्त प्रयोग की आलोचना हुई, उसके मद्देनजर विश्वविद्यालय के अधिकारियों ने जियानकुन के प्रयोग को अनैतिक और वैज्ञानिक मानदंडों के खिलाफ करार देते हुए उन्हें विश्वविद्यालय से बर्खास्त कर दिया। वैसे चर्चा है कि चीन में कुछ महीनों बाद आने वाले नए सिविल कोड में भ्रूण स्तर पर जीन-एडिटिंग को गैरकानूनी घोषित किया जाएगा।

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