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विश्व धरोहर जयपुर

— जाहिद खान —
किसी भी देश की पहचान उसकी संस्कृति और सांस्कृतिक, प्राकृतिक व ऐतिहासिक धरोहरों से होती है। ये धरोहर न सिर्फ उसे विशिष्टता प्रदान करती हैं, बल्कि दूसरे देशों से उसे अलग भी दिखलाती हैं। हमारे देश में उत्तर से लेकर दक्षिण और पूर्व से लेकर पश्चिम तक यानी चारों दिशाओं में ऐसी सांस्कृतिक, प्राकृतिक और ऐतिहासिक छटाएं बिखरी पड़ी हैं। विदेशी पर्यटक उन्हें देखकर मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। प्राचीन स्मारक, मूर्ति शिल्प, पेंटिंग, शिलालेख, प्राचीन गुफाएं, वास्तुशिल्प, ऐतिहासिक इमारतें, राष्ट्रीय पार्क, प्राचीन मंदिर, अछूते वन, पहाड़, विशालकाय रेगिस्तान, खूबसूरत समुद्रीय तट, शांत द्वीप समूह और भव्य व आलीशान किले - यह सब देश को विशिष्ट पहचान देते हैं। इन धरोहरों में से कुछ ऐसी हैं, जिनका दुनिया में कोई मुकाबला नहीं। ये सचमुच बेमिसाल हैं।
ऐसी ही एक बेमिसाल धरोहर है-राजस्थान का तकरीबन तीन सदी पुराना ऐतिहासिक शहर जयपुर। यह अब विश्व धरोहर शहर बन गया है। संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन यानी यूनेस्को की विश्व विरासत समिति ने हाल ही अजरबैजान की राजधानी बाकू में आयोजित 43 वीं बैठक में पूरी दुनिया में पिंक सिटी के तौर पर मशहूर जयपुर शहर को अपनी विश्व धरोहर सूची में शामिल कर लिया है। बैठक में शामिल 21 में से 16 देशों ने भारत का समर्थन किया।
देशवासियों के लिए यह सचमुच गर्व की बात है कि यूनेस्को ने भारत के दूसरे शहर को विश्व धरोहर का दर्जा दिया है। इससे पहले साल 2017 में गुजरात के अहमदाबाद शहर को यह मुकाम मिला था। भारत के लिए यह उपलब्धि इसलिए भी और खास मायने रखती है कि भारतीय उपमहाद्वीप के सिर्फ दो शहर-नेपाल के भक्तपुर और श्रीलंका के गॉल को ही इस सूची में शामिल होने का गौरव हासिल है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देखें, तो चंद शहर पेरिस, वियना, कैरो, ब्रूसेल्स, रोम और एडिनबरा ही इस श्रेणी में शामिल हैं।
जयपुर शहर को विश्व धरोहरों की फेहरिस्त में शामिल करने के लिए केन्द्र और राज्य सरकार दोनों, बीते दो साल से लगातार कोशिशें कर रहे थे। राजस्थान की पूर्ववर्ती भाजपा सरकार ने जयपुर को सांस्कृतिक शहरों की श्रेणी में वल्र्ड हैरिटेज सिटी का दर्जा प्रदान करने के लिए, पिछले साल अगस्त में इस शहर का विस्तृत विवरण तैयार कर, एक प्रस्ताव विश्व विरासत केन्द्र को भेजा था।
प्रस्ताव के बाद आईसीओएमओएस (स्मारक और स्थल पर अंतरराष्ट्रीय परिषद) ने शहर के दावे का निरीक्षण किया। लेकिन निरीक्षण के बाद संस्था के प्रतिनिधियों ने यह कहकर प्रस्ताव को विलंबित कर दिया कि परकोटा क्षेत्र में बड़े पैमाने पर हुए अवैध निर्माण एक बड़ा और अहम मुद्दा हैं। ये अवैध इमारतें, विरासत को बचाने के लिए लागू कानून पर सवालिया निशान लगाते हैं। लिहाजा, राजस्थान सरकार जवाब दे कि इन अवैध इमारतों के भविष्य को लेकर उसने क्या प्रस्तावित किया है। यूनेस्को के इस रुख के बाद सरकार ने परकोटा को नो कंस्ट्रक्शन जोन घोषित करने के अलावा कई अहम फैसले लिए। सरकार की ये कोशिशें आखिरकार रंग लाईं और अंतर्राष्ट्रीय स्मारक और स्थल परिषद की सिफारिश पर यूनेस्को की वल्र्ड हैरिटेज कमेटी ने जयपुर शहर को विश्व विरासत की फेहरिस्त में शामिल कर लिया। जयपुर के अलावा यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में बहरीन स्थित डिलमून बरियल मॉन्ड्स, ऑस्ट्रेलिया स्थित बड्ज बिम कल्चरल लैंडस्केप, चीन के लिआंगझू शहर स्थित पुरातात्विक खंडहर, इंडोनेशिया के सवाहलुंटो स्थित ऑम्बिलिन कोल माइन, प्राचीन जापान के माउंडेड टॉम्ब को भी शामिल किया गया है। यूनेस्को द्वारा विश्व विरासत में शामिल कर लिए जाने के बाद, वह जगह या स्मारक पूरी दुनिया की धरोहर बन जाता है। इन विश्व स्मारकों का संरक्षण यूनेस्को के इंटरनेशनल वल्र्ड हेरिटेज प्रोग्राम के तहत किया जाता है। यूनेस्को हर साल दुनिया भर के ऐसे ही बेहतरीन सांस्कृतिक और प्राकृतिक स्मारकों को सूचीबद्ध कर, उन्हें उचित देखभाल प्रदान करती है। विश्व विरासत की सूची में शामिल होने का एक फायदा यह भी होता है कि उससे दुनिया भर के पर्यटक उस ओर आकर्षित होते हैं।
राजस्थान की राजधानी जयपुर की स्थापना 17 वीं शताब्दी में सवाई जय सिंह द्वितीय ने की थी। शहर तीन ओर से अरावली पर्वतमाला से घिरा हुआ है। जयपुर की पहचान यहां के महलों और पुराने घरों में लगे गुलाबी धौलपुरी पत्थरों से होती है, जो यहां की वास्तुकला और स्थापत्य की खूबी है। साल 1876 में तत्कालीन महाराज सवाई रामसिंह द्वितीय ने इंग्लैंड की महारानी एलिज़ाबेथ, प्रिंस ऑफ वेल्स युवराज अल्बर्ट के स्वागत में पूरे शहर को गुलाबी रंग से आच्छादित करवा दिया था। तभी से शहर का नाम पिंक सिटी या गुलाबी नगरी पड़ गया। जयपुर शहर न सिर्फ ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि स्थापत्य कला के लिहाज से भी इसकी एक अलग अहमियत है। चारों और गुलाबी परकोटे से घिरे इस पुराने शहर में अनेक दरवाजे और ऐतिहासिक महत्व के महल और किले हैं, जिनके संरक्षण की जिम्मेदारी भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग (एएसआइ) पर है। इन महलों और किलों के संरक्षण का काम यहां बेहतरीन है। महलों और किलों की स्थापत्य कला व बनावट लाजवाब है। इनको देखकर अतीत का पूरा परिदृश्य मानो साकार हो जाता है। आमेर का किला, जंतर मंतर, सिटी पैलेस, जयगढ़ का किला, हवा महल, नाहरगढ़ किला, जल महल और अल्बर्ट हॉल म्यूजियम आदि ऐतिहासिक स्थल और बड़े-बड़े किले देशी-विदेशी सैलानियों को अपनी खूबसूरती और भव्यता से अचंभित कर देते हैं। यही वजह है कि सैलानी यहां खूब आते हैं। राजस्थान में विदेशी सैलानियों की पहली पसंद जयपुर शहर है। यहां की जीवंत संस्कृति, रोमांचक इतिहास, शहरवासियों की शानदार मेहमाननवाजी, खूबसूरत पैलेस और आलीशान किले उन्हें खूब भाते हैं। यूनेस्को की सूची में शामिल होने के बाद निश्चित तौर पर जयपुर में आने वाले विदेशी पर्यटकों की संख्या और भी बढ़ेगी। जिससे अन्य देशों के साथ सांस्कृतिक आदान-प्रदान बढेगा। पर्यटन बढ़ेगा तो निश्चित तौर पर रोजगार में भी बढ़ोतरी होगी। जयपुर की स्थापत्य कला और शिल्प कला को फिर से नई पहचान मिलेगी। शहर की विरासत के संरक्षण और बुनियादी सुविधाओं के लिए पैसा जुटाने का काम आसान होगा।
जयपुर के अलावा राजस्थान के चित्तौडग़ढ़, कुंभलगढ़, जैसलमेर, रणथंभोर और गागरोन के ऐतिहासिक किले पहले ही विश्व धरोहर की सूची में शामिल हैं। अब जबकि जयपुर को विश्व धरोहर का दर्जा मिल गया है, तो केन्द्र सरकार और राजस्थान सरकार दोनों की ये सामूहिक जिम्मेदारी बनती है कि वह इस शहर के ऐतिहासिक स्मारकों और पर्यटक स्थलों को और भी ज्यादा बेहतर तरीके से सहेजने और संवारने के लिए, एक व्यापक कार्ययोजना बनाए। ताकि ये अनमोल धरोहर हमारी आने वाली पीढिय़ों के लिए सुरक्षित बनी रहें। विश्व विरासत की सूची में शामिल होने के बाद, निश्चित तौर पर जिम्मेदारियों में भी इजाफा होता है। जिम्मेदारियां न सिर्फ सरकार की बढ़ी हैं, बल्कि हर भारतीय नागरिक की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह अपनी इन अनमोल ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहरों को सहेज कर रखें। उनका संरक्षण करें। इनके महत्व को खुद समझे और आने वाली पीढिय़ों को भी इनका महत्व समझाएं। एक महत्वपूर्ण बात और, जो भी विदेशी पर्यटक इन ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहरों को देखने आए, उन्हें यहां सुरक्षा, अपनत्व और विश्वास का माहौल मिले ताकि वे जब अपने देश लौटकर जाएं, तो भारत की एक अच्छी छवि और यादें उनके साथ हों।

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